पात्र का नाम -सुधा जन्म तिथि – 12/13 नवंबर 1961 जन्म समय – 02 : 00 am जन्म स्थान – सीतामढ़ी, बिहार. समस्या – भविष्य विषयक प्रश्न, स्वास्थ्य गड़बड़, सामयिक स्थिति..? समाधान – जन्म कुंडली बनाकर अध्ययन किया गया. इसके बाद सलाह दी गयी –
यति महारक्षा कवच
ग्रह अनुकूलन हेतू दो रिंग
गुरु साधना
कुत्ते को आहार देना आदि सलाह विस्तार से लिखित रूप से दिया गया.. सामग्री निर्माण हेतु आदेश मिलने पर सामग्री निर्माण करके दे दिया गया. क्रियान्वयन – बड़े मनोयोग से सारे उपायों को अमल में लाया गया. परिणाम – स्वास्थ्य में सुधार हुआ. कुछ ही समय बाद, अपना ब्यूटी पार्लर खुल गया. सामयिक स्थिति सुधर गयी.. भविष्य भी सुरक्षित हो गया. आलेख साभार : मुकुंद नंदन जी एड्रेस : उज्वल भविष्य दर्शन ज्योतिष तंत्र वास्तु शोध संस्थान खेतारी नेहरू नगर आरा, भोजपुर, बिहार. कॉल – 9334534189 आपके लिए अन्य बेजोड़ जानकारी यहाँ भी है – 🌹http://mukundnandan.blogspot.com 🌹http://yormukund.blogapot.com 🌹https://anubhuttantra.blogspot.com ✍️ 🌹http://mukundnandan.wordpress.com 🌹http://yormukund.wordpress.com 🌹https://jyotirvidmukund.family.blog/
🌹सत्य कथा🌹 पात्र – संजय सिद्ध का नाती उम्र – साढ़े 3 साल समस्या – सुनकर भी बहुत देर के बाद बोलना.. अन्यथा हमेशा चुप रहना. स्थान – दिल्ली व आरा कथा – बच्चे के पिताजी प्रोफेशनल डॉक्टर हैं पर पुत्र का ना बोलना उनकी नींद खराब कर रही थी.. ऐसे में अपने ससुर से विचार विमर्श किया. तो संजय सिद्ध ने मेरा जिक्र किया तो डॉक्टर साहेब तुरंत तैयार हो गए. बच्चे की जन्मकुंडली बनाकर मैंने अध्ययन किया. ततपश्चात मैंने एडवाइस लिखा..
ग्रह के अनुसार एक लॉकेट
औचक बाधा निवारक स्नान पैक
अन्य उपाय की जानकारी. सामग्री सिद्ध करके दे दी गयी… निर्देश के अनुसार कार्य किया गया. औचक बाधा निवारक स्नान पैक की सामग्री से स्नान करते ही बालक बोलने लगा. अब तो वही बालक इतना बोलता है कि घर बाले परेशान होकर कहने लगे है कि ये गूंगा ही ठीक था. आलेख साभार : मुकुंद नंदन जी एड्रेस : उज्वल भविष्य दर्शन ज्योतिष तंत्र वास्तु शोध संस्थान खेतारी नेहरू नगर आरा, भोजपुर, बिहार. कॉल – 9334534189/9123159684
एंटी-डाइवोर्स एंटी-एंटी ब्रेकअप तंत्र 5325 निर्माण खर्च 100+दक्षिणा 11 मात्र. प्राप्ति स्थल – उज्वल भविष्य दर्शन ज्योतिष तंत्र वास्तु शोध संस्थान, नेहरू नगर, आरा. भोजपुर, बिहार.
ब्रह्मा जी का पूजा क्या वास्तव में वर्जित है ? जहाँ तक मैं समझता हूँ.. पूजा तो आप उनके ही करते है.. जो आपको बेटा दें.. बेटी दें.. धन दें.. आदि आदि दें.. करते रहो पूजा कोई बात नहीं..सत्य तो यह है कि, ब्रह्मा जी पूजा से कुछ नहीं देते.. जो उनके निमित्त “तप” किये.. उन्हें ही ब्रह्मा ने दिया..अतः इनकी पूजा पद्धति प्रचलन में नहीं रहा.. और तो और “उनका दिया हुआ” को जल्दी ख़त्म नहीं किया जा सकता..इसलिए कहा भी गया है.. “ब्रह्मा का लिखा कोई मिटा नहीं सकता”.. ऐसा ही कुछ चाहिए तो..तप करो..ब्रम्हा जी के लिए तप कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है. इनकी पूजा इसलिए नहीं की जाती.. क्योंकि ये पूजा से नहीं तप से ही सबकुछ देते है.. भ्रम से निकलो और जागो.. तप करो.. कंही भी कभी भी..🚩.. मुकुंद.
यह एक सत्य घटना है। इस सत्य घटना का उल्लेख इसलिए किया जा रहा है, ताकि तंत्र के जिज्ञासु तंत्र की सत्यता को भली भांति समझ सके और यह जान सके कि, वास्तव में तंत्र काम करता है तो, कैसे ? पत्र का नाम – जै..न और रा..द(कोई आहत ना हो इसलिए नाम गुप्त किया जा रहा है) घटना स्थल – करमन टोला,आरा,बिहार।
एक दिन मेरे पास एक सुन्दर-सी नवयौवना आई और कहने लगी, बीते हुए डेढ़-दो साल से एक बन्दे को अपने वश में करने के लिये, न जाने कितने टोटके करवाए.. न जाने कितने जानकर मौल्वियों के ताबीज पहनवाये, फूंक मारकर सिद्ध किये हुए सामग्री खिलायी पर अबतक बे-असर रहा है। तब मैंने उनसे इसका कारण पूछा तो, उन्होंने कहा कि , हो सकता है कि तंत्र उसपर काम न कर रहा हो,आप किसी ज्योतिषी-तान्त्रिक से काम करवाओ और सभी ने आपके नाम की गुजारिश की है.. सो मैं आपके पास आई हूँ ! मैने कहा – सारी बात विस्तार से बतलओ! उसने सारी बात विस्तार से बतलायी – वह लड़का उसके खाला-खालु का है। बचपन में ही इनके माता-पिता दोनों के शादी करने की बात तय कर चुके द। सयाना होने के बाद दोनों में नजदीकियां बनी। जब शादी की चर्चा सब ओर फ़ैल चूका तो, दोनों परिवार एक जगह इकठ्ठा होकर निकाह की तारीख तय करने की सोची। खालु ने तीन लाख कॅश शादी के शादी सारा की सामान मांग रखी और जब हमलोग इतनी रकम न दे पाने की मज़बूरी बतलायी तो, वे लोग शादी करने से आनाकानी कर रहे है। यहाँ तक कि , जो लड़का खुद शादी करने की बात करता था.. अब वो भी पीछे हट गया है। वो लड़का कहता है कि , जब मेरी बढ़िया-सा जॉब लगेगा तब सोचूँगा ! मैने आगे कहा -” मैं तुम्हे यह अवश्य ही बतला सकता हूँ कि,.. तंत्र उसपर क्यों नहीं काम कर रहा है ! उसने कहा कि, प्लीज ! बतलाए मुझे ! मैने कहा कि, ऐसे ही थोड़े ही न बतला दूंगा !! इसके कुछ प्रोसेस होते है ।।जिसमे तुम्हारा ओरिजिनल डेट-टाइम-प्लेस ऑफ़ बर्थ की जरुरत पड़ेगी और इसकी निर्धारित फीस की !! उसने कहा, अभी तो मैं उतनी राशि लेकर आई हूँ और न ही मुझे अपनी असली जन्म-तारीख ही मालूम है। इसलिये मै सब व्यवस्था करके, फिर आती हुं ! दूसरे दिन ही वो आ पहुंची. प्रॉसेस पूरा कर उसको बुलाया गया और जो रिजल्ट आया था.. उसमे उस लड़के का घरेलु नाम, रजि. नाम, उसके पिता का नाम, शहर और मोहल्ले का नाम सब कुछ हु-ब-हु मैच कर रहा था, परंतु.. डायरेक्शन मैच नहीं कर रहा था और शुभ समय भी नहीं चल रहा था.. मैंने उसको बतलाया.. यही दो कारण है जिसके तुम्हारा काम नहीं हो पर रहा है। क्योकि, तुम्हारा विवाह होने की डायरेक्शन मैच नहीं कर रहा है और शुभ समय भी नहीं है। उसने कहा – “क्या कोई उपाय नही ! कि , जिस से उसकी शादी मेरे से ही हो।” “बहुत मेहनत करनी होगी और समय लगेगा.. और लगातार उस लड़के और उसके परिवार वालों के साथ संपर्क में बने रहना होगा।”-मैंने जवाब दिया.
“मैं सब कर लुंगी यह सब..खाला-खालु है.. इसलिए हमेशा आना-जाना लगा ही रहते है।”- उसने कहा. तब मैंने उसके लिए बेहतर तंत्र सामग्री की सिफारिश किया -1. मृग-मोहिनी वशीकरण कवच
शाल-चक्र वशीकरण कवच 3.प्रचंड वशीकरण सामग्री और ज्योतिषीय सुझाव. उसने तंत्र सामग्री निर्माण करवाया और सामग्री लेकर चली गयी. बात आयी-गयी..खत्म हो गयी. करीब डेढ़ साल बीत चुके होंगे.. इस घटना के … एक दिन शहर घण्टा-घर के पास मुझे एक बुरका-नसीन महिला ने कहा- “अस्सलाम वाले कुम !!” …। मैंने जवाब में कहा -“हरि ॐ” …।। वह ज़ोरों से खिलखिला पड़ी और बोली आप आज भी नहीं बदले..वही अंदाज है आपका जवाब देने का !! आपने पहचाना मुझे ? मैं जै…न !! ……अच्छा तो तुम्हरी शादी हो गयी !!.. पर किस से ? उसी से !! जिसके लिए मैं आपके पास आई थी. कितने समय हुए ? उसने कहा- क़रीब 6-7 महिना ! फिर ज्यादा बातचीत न हो पायी.. सड़क पर काफी भीड़ था..शोर-शराबा था.. वह चली गयी…। मैं भी आगे निकल आया..ज्योतिष और तंत्र पर विचार – मंथन करते हुए. (एक सत्य स्मृति) आलेख साभार : मुकुन्द नंदन Add.- उज्वल भविष्य दर्शन ज्योतिष तंत्र वास्तु शोध संस्थान खेतारी नेहरू नगर आरा -802301 भोजपुर, बिहार। Cont./whatsApp 09334534189
एक दिन की बात है एक छोटा-सा बालक मेरे पास आया और बोलै -“गुरु जी ! मेरी माँ ने आपके पास भेजा है !!
आगे कहो !
“मेरी दीदी कल कपडे बदल कर बाजार गयी थी, अभी तक लौटकर नहीं आयी है”!
“आ जाएगी”..मैंने कहा. उसके उतारे हुए कपड़े और इन सामग्रियों को लेते आना.. ऐसा कहकर मैंने सामग्री कि लिस्ट लिख कर थमा दी. वह बालक ही आया लेकिन उसके माता पीता नहीं आये..खैर जो भी हो..कपडे और सामग्री के साथ दक्षिणा द्रव्य साथ लाया था. वैसे भी बिना दक्षिणा का शुभ फल मिलता भी किसे है. मैंने सामग्री सिद्ध कर और प्रयोग करने कि विधि लिखकर तीन घंटे बाद बुलाया..वो सामग्री और प्रयोग विधि लेकर गया.
तीन दिन बाद –
गुरु जी !! वो शहर में वापस आ चुकी है.. पर घर वापस नहीं आ रही है ! वह किसी लड़के के साथ है ! पिता जी ने कहा है कि दोनों को अलग करवा दो.. जो खर्च आएगा.. वो देंगे ! अगली सामग्री भी तैयार की गयी और जो हुआ होगा उसका अनुमान लगाया जा सकता है. बस इतनी सी बात समझ लेनी चाहिए कि..तंत्र शास्त्र और शस्त्र वो शक्ति है जिसका समुचित प्रयोग सटीक विधि से किया जाये तो यह अमोघ और अचूक फलदायी होता है.
यह सत्य कथा उन दिनों की है जब मै मेट्रिक क्लास में पढ़ रहा था। आज कल के तरह पॉलीथिन बैग का चलन उस समय था। घर के लिए किराने की सामग्री कागज के बने थैला जिसको ठोंगा कहा जाता है..में आता था। एक दिन मैंने एक ठोंगे की सामग्री खाली कर के उलट-पलट कर देख रहा था। उसमें एक जगह मुझे लिखा हुआ मिला – “भगवान शिव को केवड़े और मालती के फूल नहीं चढाने चाहिए ” । मैंने आगे पढ़ने की कोशिश की पर उसमें आगे कुछ मुझे मिल नहीं पाया..क्योंकि वह कोई पुस्तक तो था नहीं.. बल्कि किसी पुस्तक के पन्नेसे बना हुआ एक ठोंगा था.. अस्तु.. मैंने कुछ पंडित जी से पूछा तो जवाब मिला कि, शास्त्रों में जो बात की मनाही है तो बस मनाही है। अब क्यों और कैसे का कोई प्रश्न नहीं करना चहिये। मै उनके बातों से संतुष्ट न हुआ। उन सभी पंडितों ने शास्त्र की गुहार मात्र लगायी थी। किसी ने मुझे संतोष जनक उत्तर नहीं दिया। अतः मैंने इस पर खुद पहल कर उत्तर ढूंढ निकाल लेने का निश्चय कर लिया।
मैने सोचा..जो बात मना की गयी है उसे ही करो ।। खुद ही समझ में आ जाएगा। बस फिर क्या था..मैंने भगवन शिव की बहुत सुन्दर सी प्रतिमा ले आया और उसको एक शिला-खंड पर स्थापित किया। फिर मेरे मन में विचार आया कि, शिव के गण तो बहुत सारे है। यदि मन की गयी बात को मैंने किया और गणो को बुरा लगा तो..शिवगण मुझे तंग करेंगे । सो मैंने शिव प्रतिमा के बगल में एक हनुमान जी की भी प्रतिमा स्थापित कर दिया ।। क्योंकि हनुमान जी के डर से भूत-प्रेतआदि शिवगण लोग भाग जायेंगे। मुझे तंग नहीं करेंगे।
तो फिर क्या था ।। शिव और हनुमान की संयुक्त साधना मैंने शुरू कर दिया। मै नित्य शिव पूजन में मालती और केवड़े का पुष्प चढाने लाग। कुछ समय व्यतीत हुआ। सब कुछ सामान्य ही था। लेकिन रात्रि में कुछ अजीबो-गरीब से स्वप्न आने लाग। उन दिनों जिस चीज का स्वाद मैंने चखे न थे। उसका भी आनंददायक स्वाद उसने मुझे चखा दिया। इतना और ऐसा आनंद कि, वैसा वास्तविक जीवन में मिल पाना संभव नहीं है।
कैसे क्या था ? किसने क्या चखा दिया ?
वाह बहुत ही सुन्दर थी ।। उसकी पतली-सी कमर, उन्नत उरोज, भरी सी नितम्ब ।। संग-मर-मर सी गोरी और सौंदर्य इतना कि, आज तक वैसी खूबसूरत कन्या-स्त्री मैंने देखे ही नही..वह नित्य रात्रि में शयन के बाद निद्रावस्था में आती थी.. मै स्वप्न देख रहा होता था कि, मै बिस्तर पर लेटा हुआ हूँ ।। वह मंद-मंद मुस्कान के साथ मंथर-गति से.. कमर को लचकाते हुए.. उरोजों को हिलाते हुए.. मेरे ओर बढ़ती चली जाती, फिर वह मेरे पैरों को सहलाती हुई मेरे ऊपर झुक जाती.. मै उसे न नहीं कह पता था ।। इसके बाद दोनों परम आनंद में डूब जाते थे। बहुत देर तक ऐसी अवस्था बनी हुई रहती और.. फिर वह हौले से उठ खड़ी होती.. मुझे अपने आगोश में भर लेती.. फिर गोद में उठा कर चल देती। वह हमेशा मुझे गोद में उठाकर उत्तर दिशा की ओर ही जाती थी। मै आनंद में डूबा हुआ सा उसके गोद मे.. जब कुछ दूरी तक चला जाता तो.. मुझे एहसास होता कि, मै किसी अज्ञात जगह की ओर जा रहा हूँ। मुझे सुरक्षा की जरुरत है। ऐसा महसूस होते ही मै हनुमान जी को गुहार लगा देता.. बस, फिर क्या था.. वह मुझे अपने गोद से नीचे गिरा देती थी। जब मै उसके गोद से नीचे गिरता था तो मुझे हलकी-सी चोट लगने की अनुभूति होती थी और मेरी नींद टूट जाती और आँखे खुल जाती थी। मै खुद को अपने विस्तार से लगभग एक बांस की दूरी पर उत्तर दिशा में गिरा हुआ पाता था। यह घटना पूरे रात भर में सिर्फ एक बार ही घटित होती थी और अगले दिन मन में अजीब सा आनंद भरा हुआ मालूम होता और दिन भर काफी थकान-सी भी महसूस होती थी।
यह घटना काफी दिनों तक चलता ही रहा। मुझे थकान और कमजोरी सी महसूस होने लगी। तब मैंने निश्चय कर लिया कि, मुझे अपने साधना में सुधार कर ही लेने चहिये। सो मैंने मालती और केवड़े के पुष्प चढाने बंद कर दिए। इसके बाद इस तरह के स्वप्न आने बंद हो गए। लेकिन नयी परेशानी शुरू हो गायी। अब रोज रात्री में कभी भगवन शिव का दर्शन होता तो कभी हनुमान जी का.. दर्शन तक तो ठीक था । लेकिन जो आगे होता वो काफी भयानक और हास्यास्पद भी था.. शिव के दर्शन होते समय वे काफी प्रसन्न मुद्रा में दिखते थे और थोड़ी ही देर बाद वे काफी गुस्से के साथ मेरे ऊपर आक्रमण कर देते और मै उनका जवाब देता रहता.. काफी हाथ-पाई हो जाती.. और लड़ते-लड़ते मेरी हालत ख़राब हो जाती.. फिर मेरी नींद खुल जाती। फिर यही दृश्य हनुमान जी के साथ देखता.. हनुमान जी से भी काफी देर तक मल्ल-युद्ध करता था। कभी – कभी हनुमान जी शिव से मुझे बचाने के लिए.. खुद शिव से लोहा लेने लगते.. तो कभी स्वप्न में हो रहे हनुमान जी के साथ युद्ध में मुझे बचने के लिए शिव खुद मेरे पक्ष से युद्ध करने लग जाते.. ओह !! ऐसा होता रहे तो.. कोई भी परेशान हो जायेगा.. एक दिन की बात हो तो कोई बात न थी.. यहाँ तो रोज ही मुझे युद्ध करने पड़ रहे थे। अंत में वयोवृद्ध के सलाह पर झाड़-फूंक करने वाले.. एक गुणी के पास मुझे जाना पड़ा। वह गुणी.. मुझे देख कर मुस्कुराए और बड़ी श्रद्धा से मुझे प्रणाम भी किया। उसकी यह बात मुझे उस वक्त समझ में न आयी। उसने आगे कहा -“अरे बाप रे..बरी बढ़िया चीज बा.. लेकिन बबुआ त.. अबही लाईके बारन.. सम्हाल न पईहन.. कहs तs.. हटा दीँही.. “‘ मैने कहा- ” हँ..हँ ! हटा दीन्हि.. परेशां हो गइल बानी.. बाप रे बाप !! बस.. उसने अपने पास पड़े सिद्ध झाड़ू को मेरे सिर से पाँव तक ७ बार उतारा.. फिर उसी दिन से ये सब परेशानी जाती रही। मै बिलकुल स्वस्थ हो गया। पर.. मेरे प्रश्न का उत्तर तो मिला ही नहीं कि, शिव को मालती और केवड़े का पुष्प क्यों नहीं चढाने चाहिये ? इस प्रश्न का उत्तर मुझे एक साल बाद मिला। बड़े ही रहस्य्मयी व्यक्ति के द्वारा.. मै मेट्रिक उत्तीर्ण हो चूका था.. मेरी दाख़िला विद्यालय के जगह अब महाविद्यालय में हुआ। एक उमंग.. एक नयी तरंग थे इन दिनो। वर्ग में पढाई पर विशेष ध्यान देने पड़ते थे ।। इन दिनों.. क्योंकि मेरे माता-पिता आज-कल के माता-पिता के तरह न थे। आज कल तो अपने बच्चे की पढाई पर होने वाले खर्च पर ही सिर्फ ध्यान देते है। लङकी है तो.. पढ़ा लिखा-कर विवाह कर देने की जल्दी होती है और यदि लड़का है तो वह पढ़-लिख कर कोई बढ़िया-सा नौकरी पकड़ ले.. ताकि, पेड़ जो उन्होंने लगाए है काफी पैसे खर्च करके.. उस खर्च की वापसी विवाह रूपी फल के द्वारा पाया जा सके। मेरे माता-पिता पढाई के लिए ट्यूशन जैसे शब्द से काफी चिढ़ते थे.. वे कहते – जो बच्चा खुद से नहीं पढ़ा या नहीं पढ़ना चाहता है.. उस पर लाख ट्यूशन लगा दो.. वह जिन्दगी में कभी पढ़ नहीं पायेगा। भले ही ऊँची डिग्रियां हासिल कर ले। लेकिन वह कोई सृजनात्मक कार्य नहीं कर सकता ।। वह तो पढ़-लिख कर कोल्हु के बैल के तरह नौकरी में सिर्फ नौकर के भांति खटेगा.. वगैरह – वगैरह !!
मै हमेशा नियम से अपनी क्लास ज्वाइन कर रहा था..एक दिन की बात है। उस दिन अचानक.. एक घंटी पढाई होने के बाद.. बाकि सारे घण्टियों की छुट्टी हो गयी। समय खाली खाली-सा लगने लगा। इस लिए मैंने निश्चय किया कि, अपनी साइकिल से थोड़ा इधर-उधर घूमूँगा.. फिर घर वापस जाऊंगा।
मै घुमता हुआ.. आरा के बी डी ओ ब्लॉक ऑफिस के पास जा पहुंचा. गर्मी के दिन थे..थोड़ी प्यास भी मुझे लग रही थी.. सो मैंने उस ऑफिस के प्रांगण में बने हुए एक शिव-मंदिर के पास चापाकल से पानी निकाल कर पिया और फिर उसी शिव-मंदिर प्रांगण में बैठ कर थोड़ी-सी सुस्ता लेने की सोची !! मैने उस मंदिर प्रांगण में एक भद्र पुरुष को भी बैठे हुए देखा.. उनकी वेश-भूषा सामान्य-सी थी। वे सफ़ेद रंग के धुली हुए धोती और कुरता पहन रखे थे। छोटे-छोटे सिर कर केश थे और अपने भाल-प्रदेश पर भगवन शिव के तरह सफ़ेद चन्दन के तिलक लगा रखे थे। उन्हें देख कर मन श्रद्धा और सम्मान के भाव से भरा जा रहा था.. सो मैंने उन्हें बड़े ही विनीत भाव से नमस्कार किया। वे अपने हाथ उठा कर आशीर्वाद दिया। मै उनके पास बैठ गया और बोलै – “आप विद्वान् मालूम होते है ।” वे बिना कुछ बोले मेरी ओर प्रेम से देखते हुए मुस्कराए। मैने आगे कहा -“मेरी एक जिज्ञासा है जो, मुझे परेशान कर रखी है.. जहाँ तक मै समझ रहा हूँ.. आप मेरी जिज्ञासा का सटीक समाधान कर देंगे ।। यदि आपकी आदेश मिले तो मै अपनी जिज्ञासा आपको सामने रखुं।” उन्हो ने कहा -”पुछो !! क्या जानकारी चाहिए तुम्हे ?” मैने कहा -“भगवान शिव को मालती और केवड़े के पुष्प क्यों नहीं चढाने चाहिए ?” उनहोने मुस्कुरा कर कहा -“तुम्हारे शिव ने ही तो श्रापित कर दिया था ।। जिस कारण अब ये पुष्प नहीं चढ़ाये जाते है”। मैने कहा -“मेरे शिव ? उन्हो ने कहा -” हाँ !!” वो क्यों और कैसे ? – मैंने पुछा। इसके जवाब में उन्हों ने एक कथा सुनाई ।। जो इस प्रकार है –
जगत सृजन के बाद.. देव, दनु और मनु के मध्य अपनी-अपनी एक अहम्-सी थी.. हर कोई अपना वर्चस्व कायम कर लेना चाह रहे थे । एक बार, ब्रह्मा और विष्णु के मध्य विवाद होने लगा कि, इस जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है ? ब्रह्मा सृजन करने के लिए खुद को श्रेष्ठ कह रहे थे तो विष्णु का कहना था.. यदि सृजित को मै संभाल न लूँ.. उसका प्रति-पालन न करूँ तो सृष्टि उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाएगी। इस सृष्टि की अस्तित्व कायम रहने का कारण मै हूँ.. अतः मै श्रेष्ठ मै ही हूँ । कोई अपने को किसी से छोटा मान लेने को तैयार न थे। विवाद बढ़ता ही चला गया और यह विवाद युद्ध का रूप लेने ही वाला था कि, उन दोनों के मध्य एक विशाल ज्योति-स्तम्भ प्रकट हुआ ।। जिसका आदि और अंत का पता ही नहीं चल रहा था। तब उन लोगो ने युद्ध के विचार का त्याग करते हुए आपस में समझौता किये कि, जो कोई इसका आदि या अंत का पता लगा लेगा.. वही श्रेष्ठ माना जाएगा। अस्तु, ब्रह्मा जी अपने हँस पर आरुढ़ हो उस ज्योति-स्तम्भ के सिर भाग की ओर चल दिए और विष्णु जी वराह रूप धारण कर नीचे की ओर चल दिए.. कोई न तो आदि का ठिकाना था और न अंत का ही !!
सिर भाग की ओर जाते हुए ब्रह्मा जी को.. रास्ते में ही मालती और केवड़े का पुष्प मिळा। उन्होंने उन्हें रोक कर पूछा – हे केवड़े और मालति के पुष्प ! तुम्हे तो किसी ने तो इस देव के सिर पर चढ़ाये होंगे.. क्या तुम्हे इस देव का सिर मिला ? उन्हो ने कहा -” हे देव !! हमलोग तो आपके दर्शन पाकर धन्य हो गए ।। लेकिन इस देव का सिर भाग मुझे अभी तक नहीं मिला और लगता है.. कि, कभी मिलने वाला भी नहीं ।।”। ब्रह्मा जी ने कहा -“ठीक है ! तू चल मेरे साथ.. सिर्फ तुम अपना-अपना मुख बंद रखना ।”.. कहकर उन दोनों पुष्पों को अपने हाथ में ले लिये। फिर वे विष्णु जी को वापस आने की संकेत दिए। दोनों उसी जगह पर वापस लौट आये जहाँ पर वे विवाद कर रहे थे।
वापस आकर मिलने पर ब्रह्मा जी ने विष्णु से पूछा -” इस ज्योति-स्तम्भ का आदि भाग मिला ? विष्णु जी विस्मित भाव में बोले – “नही !!”। ब्रह्मा जी बोले -” तो यह बताओ पुष्प देवता के किस भाग में चढ़ाये जाते है ?”। विष्णु जी बोले – “शिर पर ।। “। इतना सुनते ही ब्रह्मा जी हाथ में लिए हुए उन दोनों पुष्पों को विष्णु को दिखा दिए ।। विष्णु जी यह देख मौन सा हो गए ।। क्योकि, इस से यही साबित हो रहा था कि, ब्रह्मा जी ने उस ज्योति-स्तम्भ का सिर भाग को ढूंढ निकला है। इतना होने पर.. उस ज्योति-स्तम्भ से महादेव प्रकट हो गए । उन्हें देख ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही आश्चर्य में डूब गये। महादेव ने कहा ” इस अखिल ब्रह्माण्ड में मेरा कोई न तो आदि जान सकता है और न अंत.. लेकिन रे दुष्ट केवडे और मालती के पुष्प !! तेरे चुप रहने के कारण.. यह बात झूठी-सी बन जाती !! अतः तू अब देव पर चढ़ाये जाने योग्य नहीं है ।। आज के बाद से तू मेरे ऊपर नहीं चढाये जाओगे ।” वह विद्वान मुझे यह कथा सुनाने के बाद आगे कहा -“बस इसी कारण उस दिन के बाद से शिव पर मालति और केवड़े के पुष्प नहीं चढ़ाये जाते। इसके बाद उन्होंने कहा इसके बाद और घटना हुई थी ।। मैंने उसके विषय में भी जानकारी मांगी तो उन्होंने उस घटना की भी पूरी जानकारी दे दी और फिर कहा – “अब तुम अपने शिव को प्रणाम करो”। मै उनके पास से उठा और शिव – मंदिर के अंदर जाकर शिव-लिंग पर अपना मत्था टेका और वापस मुड़ा तो वह विद्वान पुरुष वहाँ पर न थे । मै उन्हें देखने के लिए चारो ओर दौड़-सा गया ।। लेकिन दूर – दूर तक उनका कोई अता-पता न था । इतनी जल्दी में उस जगह से कोई ओझल भी नहीं हो सकता था । मेरा मन ऐसा कह रहा था कोई मुझे मिल गया था पर मै नादानी कर गया हुँ…. मेरा मन कह रहा था वह पुरुष और कोई न थे.. साक्षात शिव ही खुद थे। मेरा मन कह रहा था ।। तुमने गुरु की महत्ता को भुला क्यों दिया ? ।। शिवलिंग की मत्था टेकने के बजाय.. जिसने ज्ञान दिया पहले उसीको मत्था क्यूँ नहीं टेका ? क्योंकि गुरु तो खुद ही ब्रह्मा-विष्णु और महेश रूप में होते है। मेरा मन कह रहा था ।। उनके चरनो को कसकर पकड़ लेटा और जिद करता की आप कोई ब्राह्मण नहीं ।। बल्कि साक्षात शिव ही हो ।। मुझे शिव रूप में दर्शन दे दो ।। तो शिव रूप का दर्शन तो हो जाता ।।यह सोच सोच कर आज तक मै पश्चाताप करता हूँ ।। और यह सोच कर आनंद भाव – विभोर हो जाता हूँ ।। कि, मेरे शिव ने मुझे गुरु रूप में दर्शन तो दिए। हरि ओम नमः शिवाय !! इसके बाद मै अपने घर लौट आया !! (एक स्मृति) लेख साभार : ज्योतिर्विद मुकुंद फोन : 09334534189
पात्र – एन. चौबे स्थान – महावीर टोला, आरा. घटनाक्रम – वे आज से लगभग साल भर पहले आये थे मेरे पास.. अपनी समस्या का समाधान पाने के लिए. उस समय मैंने कुछ सिद्ध मुद्रिका और कवच बनवा लेने की सलाह दिया था. साथ मे कुछ पूजा और टोटका करते रहने की भी सलाह दिया था. वे आधे अधूरा काम करवाये.. लेकिन जो उपाय बतलाया था मैंने उससे उनको लाभ हुआ और विश्वास जमा…. तब 2020 के फरबरी के अंत में फिर मिलने आए. पुनः कुंडली की जाँच परिक्षण करवाये..इन दिनों इनकी तबियत लगातार ख़राब चल रही थी. कुंडली में किसी गंभीर और घातक बीमारी होने का संकेत था. मैंने यह बात उनको नहीं बतलाया. बस उपाय बतलाया. इस बार वे सारे सामग्री बनवाये और मैंने सलाह दें दिया.. चाहे कुछ भी घटना घटित हो धारण किया जाने वाला सामग्री उतरना हटाने नहीं है. इधर जब लॉक डाउन चल रहा था तो उनका फोन आया.. बोलने लगे गजब हो गया था मेरे साथ..तेज बुखार के साथ कुछ भी खाने पर स्वाद ना आना..इसके साथ लीवर के पास असहनीय दर्द.. उफ्फ !! मैं होम कोरेन्टाइन हो गया..अपनी क्लिनिक बंद कर दी थी..ऐसा लग रहा था कि, अब जीवित रह पाना संभव नहीं है.. ऐसी हालत में भी मै उपाय पर ध्यान देता रहा..और लक्षण के आधार पर दवा लेता रहा..अब मैं ठीक हूँ..बस आपसे मिलना चाहता हुँ.. मैंने ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहा..अभी तो बहुत-सा एरिया कोरोना के चलते सील किया हुआ है..स्थिति सुधर जाने दीजिये.. अवश्य मिलिए.. आपका स्वगात है. बाद में मैं काफ़ी देर तक सोचता रहा कहीं वे कोरोना से संक्रमित तो नहीं हो गए थे ? यदि हाँ तो, हिम्मत और उचित उपाय और इलाज से इसी तरह ठीक हुआ जा सकता है.. जिस तरह से चौबे जी ठीक हुए. लेख साभार : ज्योतिर्विद मुकुंद ज्योतिष कार्यालय, आरा, बिहार. व्हाट्सप्प – 9334534189