जब मुझे महादेव ने दर्शन दिया-एक सत्य कथा

यह सत्य कथा उन दिनों की है जब मै मेट्रिक क्लास में पढ़ रहा था। आज कल के तरह पॉलीथिन बैग का चलन उस समय था। घर के लिए किराने की सामग्री कागज के बने थैला जिसको ठोंगा कहा जाता है..में आता था। एक दिन मैंने एक ठोंगे की सामग्री खाली कर के उलट-पलट कर देख रहा था। उसमें एक जगह मुझे लिखा हुआ मिला – “भगवान शिव को केवड़े और मालती के फूल नहीं चढाने चाहिए ” । मैंने आगे पढ़ने की कोशिश की पर उसमें आगे कुछ  मुझे मिल नहीं  पाया..क्योंकि वह  कोई पुस्तक तो था नहीं.. बल्कि किसी पुस्तक के पन्नेसे बना हुआ एक ठोंगा था.. अस्तु.. मैंने कुछ पंडित जी से पूछा तो जवाब मिला कि, शास्त्रों में जो बात की मनाही है तो बस मनाही है। अब क्यों और कैसे का कोई प्रश्न नहीं करना चहिये। मै उनके बातों से संतुष्ट न हुआ। उन सभी पंडितों ने शास्त्र की गुहार मात्र लगायी थी। किसी ने मुझे संतोष जनक उत्तर नहीं दिया। अतः मैंने इस पर खुद पहल कर उत्तर ढूंढ निकाल लेने का निश्चय कर लिया।

मैने सोचा..जो बात मना की गयी है उसे ही करो ।। खुद ही समझ में आ जाएगा। बस फिर क्या था..मैंने भगवन शिव की बहुत सुन्दर सी प्रतिमा ले आया और उसको एक शिला-खंड पर स्थापित किया। फिर मेरे मन में विचार आया कि, शिव के गण तो बहुत सारे है। यदि मन की गयी बात को मैंने किया और गणो को बुरा लगा तो..शिवगण मुझे तंग करेंगे । सो मैंने शिव प्रतिमा के बगल में एक हनुमान जी की भी प्रतिमा स्थापित कर दिया ।। क्योंकि हनुमान जी के डर से भूत-प्रेतआदि शिवगण लोग भाग जायेंगे। मुझे तंग नहीं करेंगे।

तो फिर क्या था ।। शिव और हनुमान की संयुक्त साधना मैंने शुरू कर दिया। मै नित्य शिव पूजन में मालती और केवड़े का पुष्प चढाने लाग। कुछ समय व्यतीत हुआ। सब कुछ सामान्य ही था। लेकिन रात्रि में कुछ अजीबो-गरीब से स्वप्न आने लाग। उन दिनों जिस चीज का स्वाद मैंने चखे न थे। उसका भी आनंददायक स्वाद उसने मुझे चखा दिया। इतना और ऐसा आनंद कि, वैसा वास्तविक जीवन में मिल पाना संभव नहीं है।

कैसे क्या था ? किसने क्या चखा दिया ?

वाह बहुत ही सुन्दर थी ।। उसकी पतली-सी कमर, उन्नत उरोज, भरी सी नितम्ब ।। संग-मर-मर सी गोरी और सौंदर्य इतना कि, आज तक वैसी खूबसूरत कन्या-स्त्री मैंने देखे ही नही..वह नित्य रात्रि में शयन के बाद निद्रावस्था में आती थी.. मै स्वप्न देख रहा होता था कि, मै बिस्तर पर लेटा हुआ हूँ ।। वह मंद-मंद मुस्कान के साथ मंथर-गति से.. कमर को लचकाते हुए.. उरोजों को हिलाते हुए.. मेरे ओर बढ़ती चली जाती, फिर वह मेरे पैरों को सहलाती हुई मेरे ऊपर झुक जाती.. मै उसे न नहीं कह पता था ।। इसके बाद दोनों परम आनंद में डूब जाते थे। बहुत देर तक ऐसी अवस्था बनी हुई रहती और.. फिर वह हौले से उठ खड़ी होती.. मुझे अपने आगोश में भर लेती.. फिर गोद में उठा कर चल देती। वह हमेशा मुझे गोद में उठाकर उत्तर दिशा की ओर ही जाती थी। मै आनंद में डूबा हुआ सा उसके गोद मे.. जब कुछ दूरी तक चला जाता तो.. मुझे एहसास होता कि, मै किसी अज्ञात जगह की ओर जा रहा हूँ। मुझे सुरक्षा की जरुरत है। ऐसा महसूस होते ही मै हनुमान जी को गुहार लगा देता.. बस, फिर क्या था.. वह मुझे अपने गोद से नीचे गिरा देती थी। जब मै उसके गोद से नीचे गिरता था तो मुझे हलकी-सी चोट लगने की अनुभूति होती थी और मेरी नींद टूट जाती और आँखे खुल जाती थी। मै खुद को अपने विस्तार से लगभग एक बांस की दूरी पर उत्तर दिशा में गिरा हुआ पाता था।
यह घटना पूरे रात भर में सिर्फ एक बार ही घटित होती थी और अगले दिन मन में अजीब सा आनंद भरा हुआ मालूम होता और दिन भर काफी थकान-सी भी महसूस होती थी।

यह घटना काफी दिनों तक चलता ही रहा। मुझे थकान और कमजोरी सी महसूस होने लगी। तब मैंने निश्चय कर लिया कि, मुझे अपने साधना में सुधार कर ही लेने चहिये। सो मैंने मालती और केवड़े के पुष्प चढाने बंद कर दिए। इसके बाद इस तरह के स्वप्न आने बंद हो गए। लेकिन नयी परेशानी शुरू हो गायी।
अब रोज रात्री में कभी भगवन शिव का दर्शन होता तो कभी हनुमान जी का.. दर्शन तक तो ठीक था । लेकिन जो आगे होता वो काफी भयानक और हास्यास्पद भी था..
शिव के दर्शन होते समय वे  काफी प्रसन्न मुद्रा में दिखते थे और थोड़ी ही देर बाद वे काफी गुस्से के साथ मेरे ऊपर आक्रमण कर देते और मै उनका जवाब देता रहता.. काफी हाथ-पाई हो जाती.. और लड़ते-लड़ते मेरी हालत ख़राब हो जाती.. फिर मेरी नींद खुल जाती।
फिर यही दृश्य हनुमान जी के साथ देखता.. हनुमान जी से भी काफी देर तक मल्ल-युद्ध करता था। कभी – कभी हनुमान जी शिव से मुझे बचाने के लिए.. खुद शिव से लोहा लेने लगते.. तो कभी स्वप्न में हो रहे हनुमान जी के साथ युद्ध में मुझे बचने के लिए शिव खुद मेरे पक्ष से युद्ध करने लग जाते.. ओह !! ऐसा होता रहे तो.. कोई भी परेशान हो जायेगा.. एक दिन की बात हो तो कोई बात न थी.. यहाँ तो रोज ही मुझे युद्ध करने पड़ रहे थे। अंत में वयोवृद्ध के सलाह पर झाड़-फूंक करने वाले.. एक गुणी के पास मुझे जाना पड़ा।
वह गुणी.. मुझे देख कर मुस्कुराए और बड़ी श्रद्धा से मुझे प्रणाम भी किया। उसकी यह बात मुझे उस वक्त समझ में न आयी। उसने आगे कहा -“अरे बाप रे..बरी बढ़िया चीज बा.. लेकिन बबुआ त.. अबही लाईके बारन.. सम्हाल न पईहन.. कहs तs.. हटा दीँही.. “‘
मैने कहा- ” हँ..हँ  ! हटा दीन्हि.. परेशां हो गइल बानी.. बाप रे बाप !!
बस.. उसने अपने पास पड़े सिद्ध झाड़ू को मेरे सिर से पाँव तक ७ बार उतारा.. फिर उसी दिन से ये सब परेशानी जाती रही। मै बिलकुल स्वस्थ हो गया।
पर.. मेरे प्रश्न का उत्तर तो मिला ही नहीं कि, शिव को मालती और केवड़े का पुष्प क्यों नहीं चढाने चाहिये ?
इस प्रश्न का उत्तर मुझे एक साल बाद मिला। बड़े ही रहस्य्मयी व्यक्ति के द्वारा..
मै मेट्रिक उत्तीर्ण हो चूका था.. मेरी दाख़िला विद्यालय के जगह अब महाविद्यालय में हुआ। एक उमंग.. एक नयी तरंग थे इन दिनो। वर्ग में पढाई पर विशेष ध्यान देने पड़ते थे ।। इन दिनों.. क्योंकि मेरे माता-पिता आज-कल के माता-पिता के तरह न थे। आज कल तो अपने बच्चे की पढाई पर होने वाले खर्च पर ही सिर्फ ध्यान देते है। लङकी है तो.. पढ़ा लिखा-कर विवाह कर देने की जल्दी होती है और यदि लड़का है तो वह पढ़-लिख कर कोई बढ़िया-सा नौकरी पकड़ ले.. ताकि, पेड़ जो उन्होंने लगाए है  काफी पैसे खर्च करके.. उस खर्च की वापसी  विवाह रूपी फल के द्वारा पाया जा सके। मेरे माता-पिता पढाई के लिए ट्यूशन जैसे शब्द से काफी चिढ़ते थे.. वे कहते – जो बच्चा खुद से नहीं पढ़ा या नहीं पढ़ना चाहता है.. उस पर लाख ट्यूशन लगा दो.. वह जिन्दगी में कभी पढ़ नहीं पायेगा। भले ही ऊँची डिग्रियां हासिल कर ले। लेकिन वह कोई सृजनात्मक कार्य नहीं कर सकता ।। वह तो पढ़-लिख कर कोल्हु के बैल के तरह नौकरी में सिर्फ नौकर के भांति खटेगा.. वगैरह – वगैरह !!

मै हमेशा नियम से अपनी क्लास ज्वाइन कर रहा था..एक दिन की बात है। उस दिन अचानक.. एक घंटी पढाई होने के बाद.. बाकि सारे घण्टियों की छुट्टी हो गयी। समय खाली खाली-सा लगने लगा। इस लिए मैंने निश्चय किया कि, अपनी साइकिल से थोड़ा इधर-उधर घूमूँगा.. फिर घर वापस जाऊंगा।

मै घुमता हुआ.. आरा के बी डी ओ ब्लॉक ऑफिस के पास जा पहुंचा. गर्मी के दिन थे..थोड़ी प्यास भी मुझे लग रही थी.. सो मैंने उस ऑफिस के प्रांगण में बने हुए एक शिव-मंदिर के पास चापाकल से पानी निकाल कर पिया और फिर उसी शिव-मंदिर प्रांगण में बैठ कर थोड़ी-सी सुस्ता लेने की सोची !!
मैने उस मंदिर प्रांगण में एक भद्र पुरुष को भी बैठे हुए देखा.. उनकी  वेश-भूषा सामान्य-सी थी। वे सफ़ेद रंग के धुली हुए धोती और कुरता पहन रखे थे। छोटे-छोटे सिर कर केश थे और अपने भाल-प्रदेश पर भगवन शिव के तरह सफ़ेद चन्दन के तिलक लगा रखे थे। उन्हें देख कर मन श्रद्धा और सम्मान के भाव से भरा जा रहा था.. सो मैंने उन्हें बड़े ही विनीत भाव से नमस्कार किया। वे अपने हाथ उठा कर आशीर्वाद दिया। मै उनके पास बैठ गया और बोलै – “आप विद्वान् मालूम होते है ।”
वे बिना कुछ बोले मेरी ओर प्रेम से देखते हुए मुस्कराए।
मैने आगे कहा -“मेरी एक जिज्ञासा है जो, मुझे परेशान कर रखी है.. जहाँ तक मै समझ रहा हूँ.. आप मेरी जिज्ञासा का सटीक समाधान कर देंगे ।। यदि आपकी आदेश मिले तो मै अपनी जिज्ञासा आपको सामने रखुं।”
उन्हो ने कहा -”पुछो !! क्या जानकारी चाहिए तुम्हे ?”
मैने कहा -“भगवान शिव को मालती और केवड़े के पुष्प क्यों नहीं चढाने चाहिए ?”
उनहोने मुस्कुरा कर कहा -“तुम्हारे शिव ने ही तो श्रापित कर दिया था ।। जिस कारण अब ये पुष्प नहीं चढ़ाये जाते है”।
मैने कहा -“मेरे शिव ?
उन्हो ने कहा -” हाँ !!”
वो क्यों और कैसे ? – मैंने पुछा।
इसके जवाब में उन्हों ने एक कथा सुनाई ।। जो इस प्रकार है –

जगत सृजन के बाद.. देव, दनु और मनु के मध्य अपनी-अपनी एक अहम्-सी थी.. हर कोई अपना वर्चस्व कायम कर लेना चाह रहे थे । एक बार, ब्रह्मा और विष्णु के मध्य विवाद होने लगा कि, इस जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है ?
ब्रह्मा सृजन करने के लिए खुद को श्रेष्ठ कह रहे थे तो विष्णु का कहना था.. यदि सृजित को मै संभाल न लूँ.. उसका प्रति-पालन न करूँ तो सृष्टि उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाएगी। इस सृष्टि की अस्तित्व कायम रहने का कारण मै हूँ.. अतः मै श्रेष्ठ मै ही हूँ ।
कोई अपने को किसी से छोटा मान लेने को तैयार न थे। विवाद बढ़ता ही चला गया और यह विवाद युद्ध का रूप लेने ही वाला था कि, उन दोनों के मध्य एक विशाल ज्योति-स्तम्भ प्रकट हुआ ।। जिसका आदि और अंत का पता ही नहीं चल रहा था।
तब उन लोगो ने युद्ध के विचार का त्याग करते हुए आपस में समझौता किये कि, जो कोई इसका आदि या अंत का पता लगा लेगा.. वही श्रेष्ठ माना जाएगा।
अस्तु, ब्रह्मा जी अपने हँस पर आरुढ़ हो उस ज्योति-स्तम्भ के सिर भाग की ओर चल दिए और विष्णु जी वराह रूप धारण कर नीचे की ओर चल दिए.. कोई न तो आदि का ठिकाना था और न अंत का ही !!

सिर भाग की ओर जाते हुए ब्रह्मा जी को.. रास्ते में ही मालती और केवड़े का पुष्प मिळा। उन्होंने उन्हें रोक कर पूछा – हे केवड़े और मालति के पुष्प ! तुम्हे तो किसी ने तो इस देव के सिर पर चढ़ाये होंगे.. क्या तुम्हे इस देव का सिर मिला ?
उन्हो ने कहा -” हे देव !! हमलोग तो आपके दर्शन पाकर धन्य हो गए ।। लेकिन इस देव का सिर भाग मुझे अभी तक नहीं मिला और लगता है.. कि, कभी मिलने वाला भी नहीं ।।”।
ब्रह्मा जी ने कहा -“ठीक है ! तू चल मेरे साथ.. सिर्फ तुम अपना-अपना मुख बंद रखना ।”.. कहकर उन दोनों पुष्पों को अपने हाथ में ले लिये। फिर वे विष्णु जी को वापस आने  की संकेत दिए। दोनों उसी जगह पर वापस लौट आये जहाँ पर वे विवाद कर रहे थे।

वापस आकर मिलने पर ब्रह्मा जी ने विष्णु से पूछा -” इस ज्योति-स्तम्भ का आदि भाग मिला ?
विष्णु जी विस्मित भाव में बोले – “नही !!”।
ब्रह्मा जी बोले -” तो यह बताओ पुष्प देवता के किस भाग में चढ़ाये जाते है ?”।
विष्णु जी बोले – “शिर पर ।। “।
इतना सुनते ही ब्रह्मा जी हाथ में लिए हुए उन दोनों पुष्पों को विष्णु को दिखा दिए ।। विष्णु जी यह देख मौन सा हो गए ।। क्योकि, इस से यही साबित हो रहा था कि, ब्रह्मा जी ने उस ज्योति-स्तम्भ का सिर भाग को ढूंढ निकला है।
इतना होने पर.. उस ज्योति-स्तम्भ से महादेव प्रकट हो गए । उन्हें देख ब्रह्मा   और विष्णु दोनों ही आश्चर्य में डूब गये। महादेव ने कहा ” इस अखिल ब्रह्माण्ड में मेरा कोई न तो आदि जान सकता है और न अंत.. लेकिन रे दुष्ट केवडे और मालती के पुष्प !! तेरे चुप रहने के कारण.. यह बात झूठी-सी बन जाती !! अतः तू अब देव पर चढ़ाये जाने योग्य नहीं है ।। आज के बाद से तू मेरे ऊपर नहीं चढाये जाओगे ।”
वह विद्वान मुझे यह कथा सुनाने के बाद आगे कहा -“बस इसी कारण उस दिन के बाद से शिव पर मालति और केवड़े के पुष्प नहीं चढ़ाये जाते। इसके बाद उन्होंने कहा इसके बाद और घटना हुई थी ।। मैंने उसके विषय में भी जानकारी मांगी तो उन्होंने उस घटना की भी पूरी जानकारी दे दी और फिर कहा – “अब तुम अपने शिव को प्रणाम करो”।
मै उनके पास से उठा और शिव – मंदिर के अंदर जाकर शिव-लिंग पर अपना मत्था टेका और वापस मुड़ा तो वह विद्वान पुरुष वहाँ पर न थे । मै उन्हें देखने के लिए चारो ओर दौड़-सा गया ।। लेकिन दूर – दूर तक उनका कोई अता-पता न था । इतनी जल्दी में उस जगह से कोई ओझल भी नहीं हो सकता था ।
मेरा मन ऐसा कह रहा था कोई मुझे मिल गया था पर मै नादानी कर गया हुँ….
मेरा मन कह रहा था वह पुरुष और कोई न थे.. साक्षात शिव ही खुद थे।
मेरा मन कह रहा था ।। तुमने गुरु की महत्ता को भुला क्यों दिया ? ।। शिवलिंग की मत्था टेकने के बजाय.. जिसने ज्ञान दिया पहले उसीको मत्था क्यूँ नहीं टेका ? क्योंकि गुरु तो खुद ही ब्रह्मा-विष्णु और महेश रूप में होते है।
मेरा मन कह रहा था ।। उनके चरनो को कसकर पकड़ लेटा और जिद करता की आप कोई ब्राह्मण नहीं ।। बल्कि साक्षात शिव ही हो ।। मुझे शिव रूप में दर्शन दे दो ।। तो शिव रूप का दर्शन तो हो जाता ।।यह सोच सोच कर आज तक मै पश्चाताप करता हूँ ।। और यह सोच कर आनंद भाव – विभोर हो जाता हूँ ।। कि, मेरे शिव ने मुझे गुरु रूप में दर्शन तो दिए।  हरि ओम नमः शिवाय !!
इसके बाद मै अपने घर लौट आया !!
(एक स्मृति)
लेख साभार :
ज्योतिर्विद मुकुंद
फोन : 09334534189

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